डाॅ शशि तिवारी
भारत के संविधान के अनुच्छेद 19 में वाक स्वतंत्रता का प्रावधान है और हम यह भी जानते है कि स्वतंत्रता हमेशा दोहरी होती है अर्थात् कुछ कहने की स्वतंत्रता तो कुछ ऐसा न कहने का प्रतिबंध जिससे देश की एकता, अखण्डता, बाधित होती है तथा समाज में अशांति फैलती हैं।
यूं तो किसी भी देश का यह पहला कत्र्तव्य है कि उसकी आंतरिक सुरक्षा के लिए घातक लोगों अर्थात् अवैध घुसपैठियांे पर पूर्ण प्रतिबंध हो, के लिये भारत सरकार जो भी कदम उठाए वह देश हित में ही कहलायेगा और यह एक निर्विवाद सत्य भी है, इस मूल भावना के विरूद्व कोई भी कृत्य गैर कानूनी है और निःसंदेह देशद्रोह की श्रेणी में होना चाहिए।
हाल ही में भारत सरकार के दो विधेयक पहला राष्ट्रीय नागरिकता पंजी (एन.आर.सी.) एवं दूसरा नागरिकता संशोधन अधिनियम चर्चा में हैं। राष्ट्रीय नागरिकता पंजी के बारे में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशानुसार वर्तमान में केवल राज्य विशेष (असम) में नस्लीय विशिष्टता को बनाये रखने के लिए वर्तमान में असम में लागू किया गया है जिसमें राज्य में अवैध घुसपैठियों को बाहर करने की बात है और उस पर काम भी चल रहा है चूंकि यह सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के परिपालन में हो रहा है। इसलिए किसी भी राजनीतिक दल को इसका विरोध करने का कोई भी अधिकार नहीं हैं। इसमें 25 मार्च 1971 के पहले किसी भी समुदाय का व्यक्ति जो निवास कर रहा है उसे साक्ष्य के साथ भारत की नागरिकता देने का प्रावधान हैं।
दूसरा नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 के तहत् भारत देश से सटे पाकिस्तान, अफगानिस्तान एवं बांग्लादेश के अल्पसंख्यक (हिन्दू, सिख, इसाई, बौद्ध, जैन, पारसी) जिनके देश इस्लामिक हैं एवं वह इनकी बद से बदतर स्थिति एवं शोषण प्रताड़ना एवं अत्याचार से पीड़ित हैं जो कभी मूलतः हिन्द के रहे थे। ऐसे लोगों को भारत ने एक कदम आगे बढ़ उन्हें सम्मान से जीवन जीने के लिए नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 को लाया है। सन् 1950 में नेहरू-लियाकत समझौते में अल्पसंख्यकों के हितों की रक्षा का प्रावधान था जिसे भारत ने तो पूरी शिद्दत से निभाया लेकिन पडौसी इस्लामिक मुल्कों ने नही निभाया। चूंकि भारत बड़ा भाई है अब वह उनके संरक्षण का दायित्व निभायेगा। याद हम पूर्व के अखण्ड भारत की बात करें जिसमें वर्तमान भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल, भूटान, श्रीलंका, म्यानमार एवं अफगानिस्तान आते थे। वर्तमान में प्रथम चरण में केवल तीन देशों को पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश को उनकी सीमाओं के मिलने के आधार पर सम्मिलित किया गया है जो शायद एक हद तक तर्क पूर्ण भी लगती है।
भारत के गृहमंत्री ने स्पष्टतः कहा कि इस विधेयक से भारत के अल्पसंख्यकों पर उनके अधिकारों पर किसी भी तरह का कोई भी प्रभाव नहीं पड़ेगा। इतनी स्पष्टता के बावजूद देश में अशांति फैलाने का कुत्सित प्रयास कुछ शरारती तत्व भीड़ में सम्मिलित हो देश की को न केवल क्षति पहुंचा रहे है बल्कि अशांति का वातावरण भी पैदा कर रहे हैं।
यहां कुछ मूल प्रश्न उठते हैं जब कोई भारत का अल्पसंख्यक प्रभावित नहीं होगा उसके पश्चात् भी अल्पसंख्यक संस्थाओं से ही थे अशांति की आग क्यों उठी? आशांकित कौन? क्या दाढ़ी में तिनका हैं? कौन असामाजिक तत्व इनकी अर्थात् छात्रों की आड़ ले संस्थाओं को निशाने पर ला रहे हैं? उनका क्या मकसद है, कही ये अवैध प्रवासी तो नहीं? कही ये स्लीपर सेल के तो नहीं? कही भविष्य में देश के विरूद्ध कोई गहरा षडयंत्र तो नहीं? भड़काऊ भाषण के पीछे की मंशा क्या है? का पर्दाफाश होना ही चाहिए? बहरहाल कोई भी किसी जाति, धर्म का हो उन्हें ढूंढकर देशद्रोह का मुकदमा चलाना चाहिए।
इस देश की विडम्बना ही कहेंगे कि जब कश्मीर घाटी से हिन्दुओं कश्मीरी पण्डितों को भगाया गया तब हमारे तथाकथित बुद्धिजीवी जो बात-बात पर अपने पुरूस्कारों को लौटाने के लिए एक पैर पर हमेशा खड़े ही रहते हैं की भी जवान को लकवा मार जाता है। कोई भी शिक्षण संस्था से विरोध का स्वर नहीं उठता, आखिर क्या बात है, क्या यही से कुलरिज्म हैं? वैसे संविधान में 42वें संशोधन में सेकुलर शब्द को जोड़ा गया था, क्यों जोड़ा गया, क्या मंशा थी यह एक रहस्य है।
इसी तरह गुजरात-दंगों के खिलाफ आई.ए.एस. की नौकरी छोड़ने वाले हर्ष मंदर तो इस नागरिकता संशोधन विधेयक के इतने खिलाफ थे कि उन्होंने अपने एक बयान में यह तक कह डाला कि यदि ये बिल पास होता है तो मैं अपने को मुसलमान घोषित कर दूंगा? भला कोई इनसे यह पूछे इस बिल के पहले भी धर्म परिवर्तन के लिए आपको इस स्वतंत्र भारत में किसने रोका? अब देखना होगा वह कब तक अपना धर्म परिवर्तन कर रहे हैं या फिर ये सिर्फ एक शगूफा था।
नागरिकता का भारत के संविधान में अस्तित्व 5-11 अनुच्छेद (आर्टिकल) में पहले से ही विद्यमान हैं एवं नागरिकता एक्ट में 1995 में समय≤ पर 1986, 92, 2003, 2005, 2015 में संशोधन हुए इसके पूर्व भी 566 मुसलमानों को इसके तहत् भारत की नागरिकता दी गई। छठवीं अनुसूची के क्षेत्रों को नवीन संशोधित नागरिकता अधिनियम से बाहर रखा जिसमें अरूणाचल, मणिपुर, नागालैण्ड, मिजोरम, मेघालय, त्रिपुरा आदि पर यह लागू नही होगा। यद्यपि अरूणाचल, नागालैण्ड, मिजोरम में पहले से ही ‘‘इनरलाईन परमिट’’ की व्यवस्था है।
वास्तव में एन.आर.सी. में उन लोगों को भारत का नागरिक माना जो 25 माच्र 1971 से पहले असम में रह रहे थे और जो इस बात का सबूत पेश नहीं कर सके। उन्हें एन.आर.सी. सूची से बाहर कर दिया अर्थात् ये अवैध है। चूंकि भारत-पाक युद्ध 1971 में पाक से टूट नया बना देश बांग्लादेश उस समय कई बांग्लादेशी भारत में घुस आये थे तब से यही बस गये। जबकि केब (सी.ए.बी.) नागरिकता देने का अधिनियम है लेने का नहीं। मेरे ख्याल से लोगों को ‘‘केब’’ से दिक्कत नहीं है। दिक्कत एन.आर.सी. से होगी यदि ये पूरे भारत में लागू हुई तो भारत में बसे अवैध नागरिकों की पहचान हो जाएगी। हाल ही की अशांति की जड़ में शायद इसी का भय है।
शशि फीचर.ओ.आर.जी. लेखिका सूचना मंत्र की संपादक हैं
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